पद – 1
1. "ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।"
शब्दार्थ
ऊधौ = उद्धव
अति = बहुत
बड़भागी = अत्यंत भाग्यशाली
सरल अर्थ
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं—"हे उद्धव! तुम बहुत भाग्यशाली हो।"
विस्तृत व्याख्या
यहाँ गोपियाँ वास्तव में उद्धव की प्रशंसा नहीं कर रही हैं, बल्कि व्यंग्य कर रही हैं। उनका आशय है—
"तुम भाग्यशाली इसलिए हो क्योंकि तुमने कभी सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं किया।"
जो व्यक्ति प्रेम में नहीं पड़ता, उसे विरह (बिछड़ने) का दुःख भी नहीं सहना पड़ता। इसलिए गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक उन्हें भाग्यशाली कहती हैं।
2. "अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।"
शब्दार्थ
अपरस = स्पर्श न करना
सनेह = प्रेम
तगा = धागा
अनुराग = गहरा प्रेम
सरल अर्थ
तुम प्रेम के धागे से कभी बँधे ही नहीं, इसलिए तुम्हारे मन में किसी के प्रति प्रेम नहीं है।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं—
"तुम्हारा हृदय कभी प्रेम के बंधन में नहीं बँधा।"
यहाँ "सनेह तगा" अर्थात प्रेम का धागा एक रूपक है।
जिस प्रकार धागा दो वस्तुओं को जोड़ देता है, उसी प्रकार प्रेम दो हृदयों को जोड़ देता है। लेकिन उद्धव कभी इस बंधन में नहीं बँधे, इसलिए वे प्रेम की पीड़ा नहीं समझ सकते।
3. "पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।"
शब्दार्थ
पुरइनि पात = कमल का पत्ता
जल भीतर = पानी में
दागी = भीगना
सरल अर्थ
जैसे कमल का पत्ता पानी में रहने पर भी नहीं भीगता।
विस्तृत व्याख्या
कमल का पत्ता पूरे समय पानी में रहता है, लेकिन उसकी सतह पर पानी टिकता नहीं।
इसी प्रकार—
उद्धव संसार में रहते हुए भी प्रेम और मोह से बिल्कुल अछूते हैं।
अर्थात वे किसी भी भावना से प्रभावित नहीं होते।
4. "ज्यों जल माँह तेल की गागरि, बूँद न ताको लागी।"
शब्दार्थ
जल माँह = पानी में
तेल की गागरि = तेल से भरा घड़ा
ताको = उस पर
सरल अर्थ
जैसे पानी में रखा तेल का घड़ा भी पानी से नहीं भीगता।
विस्तृत व्याख्या
तेल और पानी कभी एक-दूसरे में नहीं मिलते।
इसी प्रकार—
उद्धव के हृदय में प्रेम प्रवेश ही नहीं कर पाया।
वे संसार में रहते हुए भी भावनाओं से अलग हैं।
5. "प्रीति-नदी में पाँउ न बोरयो, दृष्टि न रूप परागी।"
शब्दार्थ
प्रीति = प्रेम
बोरयो = डुबोया
रूप = सौन्दर्य
परागी = मोहित होना
सरल अर्थ
तुमने प्रेम की नदी में कभी पैर तक नहीं रखा और न ही श्रीकृष्ण के रूप-सौन्दर्य पर मोहित हुए।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं—
"तुमने कभी प्रेम का अनुभव नहीं किया।"
तुमने कभी श्रीकृष्ण की मधुर मुस्कान, उनकी बाँसुरी, उनके सौन्दर्य और प्रेम का रस नहीं चखा।
इसलिए तुम हमें योग और वैराग्य का उपदेश दे रहे हो।
6. "'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यों पागी।"
शब्दार्थ
अबला = स्त्री
भोरी = भोली
गुर = गुड़
चाँटी = चींटी
पागी = चिपक जाना
सरल अर्थ
हम भोली स्त्रियाँ तो गुड़ से चिपकी हुई चींटी की तरह श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूब चुकी हैं।
विस्तृत व्याख्या
चींटी जब गुड़ पर चढ़ती है, तो उसकी मिठास के कारण उसी से चिपक जाती है और आसानी से अलग नहीं हो पाती।
उसी प्रकार—
गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूब चुकी हैं।
अब उनसे कृष्ण का प्रेम छोड़ना असंभव है।
यही कारण है कि वे उद्धव के ज्ञान और वैराग्य के उपदेश को स्वीकार नहीं कर सकतीं।
पूरे पद का भावार्थ
इस पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि—
तुम बहुत भाग्यशाली हो क्योंकि तुमने कभी प्रेम नहीं किया।
तुम्हारा मन कमल के पत्ते और तेल के घड़े की तरह संसार में रहकर भी प्रेम से अछूता है।
तुमने कभी श्रीकृष्ण के प्रेम और सौन्दर्य का अनुभव नहीं किया।
लेकिन हम गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम में इतनी अधिक डूब चुकी हैं कि अब उनसे अलग होना असंभव है।
इसलिए हमें योग, ज्ञान और वैराग्य का उपदेश देना व्यर्थ है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण अलंकार
| पंक्ति | अलंकार |
|---|---|
| सनेह तगा | रूपक अलंकार |
| पुरइनि पात रहत जल भीतर | उपमा अलंकार |
| ज्यों जल माँह तेल की गागरि | उपमा अलंकार |
| प्रीति-नदी | रूपक अलंकार |
| गुर चाँटी ज्यों पागी | उपमा अलंकार |
मुख्य संदेश
सूरदास इस पद के माध्यम से बताते हैं कि सच्चा प्रेम ज्ञान, तर्क और वैराग्य से कहीं अधिक गहरा होता है। जिसने प्रेम का अनुभव नहीं किया, वह प्रेम की पीड़ा और उसकी महानता को कभी नहीं समझ सकता।
पद – 2
1. "मन की मन ही माँझ रही।"
शब्दार्थ
मन की = मन की बात
माँझ = भीतर
सरल अर्थ
हमारे मन की बात हमारे मन में ही रह गई।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं कि वे श्रीकृष्ण से अपने प्रेम, अपनी पीड़ा और अपने विरह की बातें कभी खुलकर नहीं कह सकीं। अब जब श्रीकृष्ण मथुरा चले गए हैं, तब उनके हृदय की सारी बातें मन में ही दबकर रह गई हैं।
भाव: जो प्रेम व्यक्त नहीं हो पाया, वही सबसे अधिक पीड़ा देता है।
2. "कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।"
शब्दार्थ
कहिए जाइ = जाकर किससे कहें
परत = अवसर मिलना
सरल अर्थ
हे उद्धव! अब हम अपनी पीड़ा किससे कहें? हमें कोई ऐसा नहीं मिलता जिससे हम अपने मन की बात कह सकें।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ पूरी तरह अकेली हो चुकी हैं। पहले वे श्रीकृष्ण से अपने सुख-दुःख बाँटती थीं। अब उनके जाने के बाद ऐसा कोई नहीं बचा जो उनकी बात समझ सके।
इसलिए वे उद्धव से कहती हैं—
"तुम हमारे दुःख को नहीं समझ सकते, क्योंकि तुम प्रेम के मार्ग पर नहीं चले हो।"
3. "अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।"
शब्दार्थ
अवधि = निश्चित समय
अधार = सहारा
आवन = आने का
बिथा = पीड़ा
सरल अर्थ
श्रीकृष्ण के लौट आने की आशा ही हमारा सहारा थी। उसी आशा के बल पर हमने शरीर और मन की सारी पीड़ा सह ली।
विस्तृत व्याख्या
जब श्रीकृष्ण मथुरा गए थे, तब गोपियों को विश्वास था कि वे एक दिन अवश्य लौटेंगे।
इसी आशा ने उन्हें जीवित रखा।
आशा मनुष्य को कठिन से कठिन दुःख सहने की शक्ति देती है।
4. "अब इन जोग संदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।"
शब्दार्थ
जोग = योग
संदेसनि = संदेश
बिरहिनि = विरहिणी (जिसका प्रिय दूर हो)
दही = जलना
सरल अर्थ
अब तुम्हारे योग के संदेश सुन-सुनकर हमारा विरह और भी बढ़ गया है।
विस्तृत व्याख्या
उद्धव श्रीकृष्ण का संदेश लेकर आए थे कि गोपियाँ योग करें, मन को वश में रखें और मोह छोड़ दें।
लेकिन गोपियाँ कहती हैं—
"तुम्हारी बातें हमारे घाव पर मरहम नहीं, बल्कि नमक छिड़कने जैसी हैं।"
जिसे प्रेम-विरह की पीड़ा हो, उसे वैराग्य का उपदेश देना उसके दुःख को और बढ़ा देता है।
5. "चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तें, उत तैं धार बही।"
शब्दार्थ
गुहारि = विनती
जितहिं तें = जिस ओर से
धार = आँसुओं की धारा
सरल अर्थ
हम जहाँ अपनी बात कहना चाहती हैं, वहीं से हमारी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ जब भी श्रीकृष्ण का नाम लेने या अपना दुःख सुनाने का प्रयास करती हैं, वे इतनी भावुक हो जाती हैं कि बोल नहीं पातीं।
उनकी आँखों से केवल आँसू बहने लगते हैं।
यह विरह की चरम अवस्था का चित्रण है।
6. "'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यों, मरजादा न लही।"
शब्दार्थ
धीर = धैर्य
मरजादा = सीमा
सरल अर्थ
अब हम धैर्य कैसे रखें? हमारे दुःख ने तो सारी सीमाएँ पार कर दी हैं।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं—
"अब धैर्य रखना हमारे बस की बात नहीं रही।"
विरह की अग्नि इतनी प्रबल हो चुकी है कि वह उनकी सहन-शक्ति की सीमा से बाहर निकल गई है।
इसलिए वे उद्धव के उपदेश को स्वीकार नहीं कर सकतीं।
पूरे पद का भावार्थ
इस पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उनके हृदय की सारी बातें मन में ही रह गईं। श्रीकृष्ण के लौटने की आशा ही उनके जीवन का सहारा थी। अब जब उद्धव योग और वैराग्य का संदेश लेकर आए हैं, तो उनकी विरह-पीड़ा और बढ़ गई है। वे अपना दुःख किसी से कह भी नहीं सकतीं, क्योंकि बोलने से पहले ही उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। अब उनका दुःख इतना बढ़ चुका है कि धैर्य रखना भी संभव नहीं रहा।
प्रमुख अलंकार
| पंक्ति | अलंकार |
|---|---|
| मन की मन ही माँझ रही | अनुप्रास अलंकार ("मन" की पुनरावृत्ति) |
| बिरहिनि बिरह दही | अनुप्रास एवं पुनरुक्ति प्रकाश |
| धार बही | रूपक (आँसुओं को धारा के रूप में प्रस्तुत करना) |
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न: गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को क्यों स्वीकार नहीं करतीं?
उत्तर:
गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम में पूर्णतः डूबी हुई हैं। उनके लिए श्रीकृष्ण का प्रेम ही जीवन का आधार है। उद्धव का योग और वैराग्य का संदेश उनके विरह-दुःख को कम करने के बजाय और बढ़ा देता है। इसलिए वे योग-संदेश को स्वीकार नहीं करतीं।
मुख्य संदेश
इस पद में सूरदास ने यह बताया है कि सच्चे प्रेम में तर्क, ज्ञान और वैराग्य का कोई स्थान नहीं होता। विरह की पीड़ा केवल वही समझ सकता है जिसने प्रेम किया हो।
पद – 3
1. "हमारें हरि हारिल की लकरी।"
शब्दार्थ
हरि = श्रीकृष्ण
हारिल = एक पक्षी (हारिल/हरियल)
लकरी = लकड़ी या तिनका
सरल अर्थ
हमारे लिए श्रीकृष्ण उसी प्रकार हैं जैसे हारिल पक्षी के लिए उसका तिनका।
विस्तृत व्याख्या
हारिल पक्षी के बारे में मान्यता है कि वह उड़ते समय भी अपने पंजों में एक तिनका या लकड़ी पकड़े रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता।
उसी प्रकार—
गोपियाँ अपने हृदय में श्रीकृष्ण को हर समय थामे रहती हैं।
वे उनसे एक क्षण के लिए भी अलग नहीं हो सकतीं।
यहाँ "हारिल की लकरी" कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और अटूट लगाव का प्रतीक है।
2. "मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।"
शब्दार्थ
मन = विचार
क्रम (कर्म) = कार्य
बचन = वचन
नंद-नंदन = नंद बाबा के पुत्र श्रीकृष्ण
उर = हृदय
दृढ़ = मजबूत
सरल अर्थ
हमने अपने मन, कर्म और वचन से श्रीकृष्ण को अपने हृदय में दृढ़ता से बसा लिया है।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं—
हम केवल नाम से नहीं, बल्कि—
मन से कृष्ण को सोचती हैं।
कर्म से कृष्ण की सेवा करती हैं।
वचन से कृष्ण का गुणगान करती हैं।
अर्थात उनका पूरा जीवन श्रीकृष्ण को समर्पित है।
3. "जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।"
शब्दार्थ
जागत = जागते हुए
सोवत = सोते हुए
स्वप्न = सपने में
दिवस-निसि = दिन-रात
कान्ह = कृष्ण
जक री = जपना या पुकारना
सरल अर्थ
हम जागते, सोते, सपने में, दिन-रात केवल श्रीकृष्ण का ही नाम लेती रहती हैं।
विस्तृत व्याख्या
गोपियों का जीवन कृष्णमय हो चुका है।
उनके लिए—
जागना = कृष्ण
सोना = कृष्ण
सपना = कृष्ण
दिन = कृष्ण
रात = कृष्ण
उनके मन में कृष्ण के अतिरिक्त किसी और का स्थान नहीं है।
4. "सुनत जोग लागत है ऐसो, ज्यों करुई ककरी।"
शब्दार्थ
जोग = योग
करुई = कड़वी
ककरी = ककड़ी
सरल अर्थ
तुम्हारा योग का उपदेश हमें कड़वी ककड़ी जैसा लगता है।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं—
"जिस व्यक्ति का हृदय प्रेम से भरा हो, उसे वैराग्य का उपदेश अच्छा नहीं लग सकता।"
जिस प्रकार मीठा खाने वाले को अचानक कड़वी वस्तु अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार कृष्ण-प्रेम में डूबी गोपियों को योग का ज्ञान बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।
5. "सु तो ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।"
शब्दार्थ
ब्याधि = बीमारी
लै आए = लेकर आए
देखी सुनी न करी = न कभी देखी, न कभी सुनी
सरल अर्थ
तुम तो हमारे लिए ऐसी बीमारी लेकर आए हो, जिसे हमने न कभी देखा और न कभी सुना।
विस्तृत व्याख्या
यहाँ योग के उपदेश को बीमारी कहा गया है।
गोपियाँ कहती हैं—
"हमें तो केवल श्रीकृष्ण का प्रेम चाहिए।"
लेकिन तुम प्रेम की जगह योग और वैराग्य की ऐसी बात लेकर आए हो जो हमारे लिए रोग के समान है।
यह व्यंग्य भी है और उनके प्रेम की गहराई भी दिखाता है।
6. "यह तो 'सूर' तिनहिं ले सौंपी, जिनके मन चकरी।"
शब्दार्थ
तिनहिं = उन्हें
सौंपी = दे दो
मन चकरी = जिनका मन चंचल है
सरल अर्थ
हे उद्धव! यह योग का ज्ञान उन लोगों को दे दो जिनका मन चंचल है।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं—
हमारा मन तो पहले ही श्रीकृष्ण को समर्पित हो चुका है।
जिसका मन इधर-उधर भटकता हो, उसे योग की आवश्यकता होती है।
लेकिन—
जिसका मन केवल श्रीकृष्ण में स्थिर हो गया हो, उसे योग सिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
पूरे पद का भावार्थ
इस पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उनका सम्पूर्ण जीवन श्रीकृष्ण को समर्पित है। वे मन, वचन और कर्म से केवल श्रीकृष्ण का ही स्मरण करती हैं। जागते, सोते और सपनों में भी उन्हें केवल श्रीकृष्ण ही दिखाई देते हैं। इसलिए योग और वैराग्य का उपदेश उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा अप्रिय लगता है। वे उद्धव से कहती हैं कि यह उपदेश उन लोगों को दें जिनका मन चंचल है; हमारा मन तो पहले ही श्रीकृष्ण के चरणों में स्थिर हो चुका है।
प्रमुख अलंकार
| पंक्ति | अलंकार |
|---|---|
| हरि हारिल की लकरी | रूपक एवं प्रतीक |
| मन, क्रम, बचन | अनुप्रास एवं त्रिपदी प्रयोग |
| जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि | पुनरुक्ति प्रकाश |
| ज्यों करुई ककरी | उपमा अलंकार |
| ब्याधि | रूपक (योग को रोग के रूप में प्रस्तुत करना) |
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न: गोपियाँ योग को "करुई ककरी" (कड़वी ककड़ी) क्यों कहती हैं?
उत्तर:
गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम में पूर्णतः डूबी हुई हैं। उनके लिए प्रेम ही जीवन का आनंद है। उद्धव का योग और वैराग्य का उपदेश उन्हें प्रेम से दूर करने वाला लगता है। इसलिए वह उन्हें कड़वी ककड़ी की तरह अप्रिय और बेस्वाद प्रतीत होता है।
विशेष प्रतीकों का अर्थ (बहुत महत्वपूर्ण)
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| हारिल की लकरी | अटूट लगाव, जिसे कभी छोड़ा न जाए |
| करुई ककरी | अप्रिय एवं कष्टदायक योग का उपदेश |
| ब्याधि | योग और वैराग्य का ऐसा संदेश जो प्रेमियों के लिए पीड़ादायक हो |
| मन चकरी | चंचल, अस्थिर मन वाले लोग |
मुख्य संदेश
इस पद में सूरदास यह सिद्ध करते हैं कि सच्ची भक्ति में मन पूरी तरह भगवान में स्थिर हो जाता है। ऐसे भक्त के लिए योग, वैराग्य और तर्क गौण हो जाते हैं; उसका सबसे बड़ा साधन केवल प्रेम और समर्पण होता है।
पद – 4
1. "हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।"
शब्दार्थ
हरि = श्रीकृष्ण
राजनीति = राजनीति, कूटनीति, चतुराई
पढ़ि आए = सीखकर आए हैं
सरल अर्थ
गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण मथुरा जाकर राजनीति और कूटनीति सीख आए हैं।
विस्तृत व्याख्या
यहाँ गोपियाँ व्यंग्य करती हैं। वे कहती हैं—
"हमारे भोले-भाले कृष्ण अब पहले जैसे नहीं रहे। मथुरा जाकर वे राजनीति और चतुराई सीख गए हैं।"
पहले वे सरल और प्रेममय थे, लेकिन अब वे प्रेम की जगह तर्क और नीति की बातें करने लगे हैं।
2. "समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।"
शब्दार्थ
समुझी बात = सोच-समझकर कही गई बात
मधुकर = भँवरा (यहाँ उद्धव के लिए)
समाचार = समाचार, संदेश
सरल अर्थ
हे उद्धव! तुम्हारी बातें सुनकर हम सब समझ गई हैं।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ उद्धव को "मधुकर" (भँवरा) कहकर संबोधित करती हैं।
वे कहती हैं—
"तुम्हारे संदेश से हमें समझ में आ गया कि श्रीकृष्ण अब बदल चुके हैं।"
यहाँ मधुकर शब्द का प्रयोग इसलिए भी है क्योंकि भँवरा एक फूल से दूसरे फूल पर जाता है। उसी प्रकार गोपियों को लगता है कि कृष्ण भी अब उनसे दूर हो गए हैं।
3. "इक अति चतुर हुते पहिले ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।"
शब्दार्थ
अति चतुर = बहुत चालाक
गुरु ग्रंथ = ज्ञान और योग के ग्रंथ
सरल अर्थ
श्रीकृष्ण पहले से ही बहुत चतुर थे, अब तो उन्होंने गुरु से ज्ञान के ग्रंथ भी पढ़ लिए हैं।
विस्तृत व्याख्या
यहाँ गोपियाँ फिर से व्यंग्य करती हैं।
वे कहती हैं—
"पहले तो केवल चतुर थे, अब तो बड़े ज्ञानी भी बन गए हैं।"
इसी कारण उन्होंने हमें प्रेम का संदेश भेजने के बजाय योग और वैराग्य का उपदेश भेज दिया।
4. "बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-संदेस पठाए।"
शब्दार्थ
बढ़ी बुद्धि = अधिक बुद्धिमान
जोग-संदेस = योग का संदेश
सरल अर्थ
हमें लगता है कि उनकी बुद्धि बहुत बढ़ गई है, तभी उन्होंने हमें योग का संदेश भेजा है।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं—
"यदि कृष्ण सचमुच इतने बुद्धिमान हो गए हैं, तो उन्हें यह भी समझना चाहिए था कि प्रेम करने वालों को योग का उपदेश नहीं दिया जाता।"
वे कृष्ण के इस व्यवहार से दुखी भी हैं और नाराज़ भी।
5. "ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।"
शब्दार्थ
भले लोग = अच्छे लोग
पर हित = दूसरों का भला
धाए = दौड़ पड़ते हैं
सरल अर्थ
हे उद्धव! अच्छे लोग तो दूसरों का भला करने के लिए तुरंत दौड़ पड़ते हैं।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ उद्धव के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए कहती हैं—
"तुम तो अच्छे हो, क्योंकि दूसरों का भला करने के लिए यहाँ आए हो।"
लेकिन वे यह भी संकेत देती हैं कि केवल संदेश पहुँचाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी पीड़ा को समझना भी आवश्यक है।
6. "अब अपने मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।"
शब्दार्थ
मन फेर = मन वापस लेना
चुराए = चुरा लिया
सरल अर्थ
अब यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण अपना मन वापस ले लें, जिसे जाते समय वे हमारे पास छोड़ गए थे।
विस्तृत व्याख्या
यहाँ गोपियाँ अत्यंत मार्मिक बात कहती हैं।
वे कहती हैं—
"जब श्रीकृष्ण मथुरा गए, तब वे अपना मन हमारे पास छोड़ गए और हमारा मन अपने साथ ले गए।"
अब यदि वे हमसे संबंध तोड़ना चाहते हैं, तो पहले अपना मन वापस ले जाएँ और हमारा मन लौटा दें।
यह प्रेम की पूर्ण एकात्मता का सुंदर चित्रण है।
7. "ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।"
शब्दार्थ
अनीति = अन्याय
आपुन = स्वयं
छुड़ाए = छुड़ाते हैं
सरल अर्थ
जो स्वयं दूसरों को अन्याय से बचाते हैं, वे स्वयं अन्याय कैसे कर सकते हैं?
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ कहती हैं—
"श्रीकृष्ण तो धर्म की स्थापना करने वाले हैं।"
यदि वे ही प्रेम करने वालों को छोड़ दें, तो यह तो अन्याय होगा।
वे कृष्ण से न्यायपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा करती हैं।
8. "राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए।"
शब्दार्थ
राज धर्म = राजा का कर्तव्य
प्रजा = जनता
सताए = दुःख देना
सरल अर्थ
सूरदास कहते हैं कि राजा का धर्म यही है कि वह अपनी प्रजा को दुःख न दे।
विस्तृत व्याख्या
गोपियाँ अंत में श्रीकृष्ण को राजा मानकर कहती हैं—
"यदि तुम अब मथुरा के राजा हो, तो राजा का धर्म है कि वह अपनी प्रजा को कष्ट न दे।"
लेकिन तुमने हमें विरह की आग में जलने के लिए छोड़ दिया है।
इसलिए तुम अपने राजधर्म का पालन नहीं कर रहे हो।
पूरे पद का भावार्थ
इस पद में गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं कि मथुरा जाकर श्रीकृष्ण राजनीति और कूटनीति सीख गए हैं। पहले वे प्रेम और स्नेह से भरे थे, लेकिन अब उन्होंने योग और ज्ञान का संदेश भेजा है। गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण उनका मन अपने साथ ले गए हैं और अपना मन उनके पास छोड़ गए हैं। यदि वे सचमुच धर्म और न्याय के रक्षक हैं, तो उन्हें अपनी प्रजा अर्थात् गोपियों को विरह का दुःख नहीं देना चाहिए। इस प्रकार इस पद में प्रेम, विरह, व्यंग्य और कृष्ण के प्रति गहरा समर्पण व्यक्त हुआ है।
प्रमुख अलंकार
| पंक्ति | अलंकार |
|---|---|
| हरि हैं राजनीति पढ़ि आए | व्यंग्य |
| मधुकर | रूपक (उद्धव को भँवरे के रूप में संबोधित करना) |
| मन चुराए | रूपक |
| राज धरम | रूपक एवं नीति कथन |
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न: गोपियाँ श्रीकृष्ण पर "राजनीति पढ़ि आए" कहकर व्यंग्य क्यों करती हैं?
उत्तर:
गोपियाँ मानती हैं कि मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण पहले जैसे सरल और प्रेममय नहीं रहे। उन्होंने प्रेम का संदेश भेजने के बजाय योग और वैराग्य का संदेश भेजा। इसलिए गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं कि वे मथुरा जाकर राजनीति और कूटनीति सीख आए हैं।
विशेष प्रतीकों का अर्थ (महत्वपूर्ण)
| प्रतीक | अर्थ |
|---|---|
| राजनीति | चतुराई, कूटनीति, प्रेम से दूरी |
| मधुकर | उद्धव (संदेशवाहक) |
| मन चुराना | प्रेम में पूर्ण आत्मसमर्पण |
| राजधर्म | शासक का कर्तव्य—अपनी प्रजा की रक्षा करना |
मुख्य संदेश
इस पद में सूरदास ने दिखाया है कि सच्चे प्रेम में केवल उपदेश नहीं, बल्कि साथ और संवेदना की आवश्यकता होती है। गोपियाँ श्रीकृष्ण के व्यवहार पर व्यंग्य करती हैं, परंतु उनके प्रति उनका प्रेम और विश्वास फिर भी अटूट बना रहता है।
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